हिमालय के पास बचे बस 18 साल, सिर्फ किस्से-कहानियों में ही रह जाएगा

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आज दुनिया के ग्लेश्यिरों पर संकट मंडरा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है ग्लोबल वार्मिंग, जिसके चलते बढ़ रहे तापमान का बुरा असर ग्लेशियरों पर पड़ रहा है। परिणामस्वरूप वे पिघल रहे हैं। उनके पिघलने की यदि यही रफ्तार जारी रही तो वह दिन दूर नहीं जब 21वीं सदी के आखिर तक एशिया और 2035 तक हिमालय के ग्लेशियर गायब हो जाएंगे। उनका नाम केवल किताबों में ही शेष रह जाएगा। यह ग्लोबल वार्मिंग का ही असर है कि आर्कटिक में लाल बर्फ तेजी से बन रही है और उसके परिणामस्वरूप वहां ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार और तेज हो गई है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते हमारे उच्च हिमालयी इलाके में जहां पर एक समय केवल बर्फ गिरा करती थी वहां अब बारिश हो रही है। यह स्थिति भयावह खतरे का संकेत है। देखा जाए तो 1850 के आसपास औद्योगिक क्रांति से पहले की तुलना में धरती एक डिग्री गर्म हुई है। वैज्ञानिकों की मानें तो उनको इस बात का भय सता रहा है कि उनके द्वारा निर्धारित तापमान में बढ़ोतरी की दो डिग्री की सीमा को 2100 तक बचा पाना संभव नहीं दिख रहा है। उनका मानना है कि यदि ऐसा होता है तो एशिया में ग्लेशियरों का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

नीदरलैंड और हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय भूभौतिकी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लेशियरों के पिघलने का सबसे बड़ा और अहम कारण ग्लोबल वार्मिंग है। उनके शोध के अनुसार ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने से समुद्री जलस्तर में एक से 1.2 फीट तक की वृद्धि हो सकती है। इसका असर मुंबई, न्यूयॉर्क, लंदन और पेरिस जैसे शहरों पर पड़ेगा। यही नहीं कृत्रिम झीलों के बनने से 2013 में उत्तराखंड में आई केदारनाथ जैसी त्रासदी के खतरे भी बढ़ेंगे। जर्नल नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित एक शोध में इस बात का खुलासा हुआ है कि आर्कटिक में बन रही लाल बर्फ से ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार 20 फीसद बढ़ जाती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार उसमें पाए जाने वाले जीवाणु वहां की बर्फीली सतह का रंग बदल कर लाल कर दे रहे हैं। परिणामस्वरूप सूर्य की रोशनी को परावर्तित करने की उनकी क्षमता दिन-ब-दिन कम होती जा रही है। इससे लाल बर्फ में सूर्य की रोशनी और उष्मा ज्यादा अवशोषित हो रही है। इससे बर्फ के पिघलने की रफ्तार तेज हो गई है। यहां ग्लेशियरों के पिघलने का नतीजा यह होगा कि आर्कटिक की कार्बन सोखने की क्षमता प्रभावित होगी। वह दिनोंदिन कम होती चली जाएगी। यदि यही हाल रहा तो एक दिन ऐसा आएगा कि कार्बन डाईऑक्साइड अवशोषित करने की क्षमता आर्कटिक पूरी तरह खो देगा। यह कार्बन डाईऑक्साइड वातावरण में रहकर ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने के कारक के रूप में काम करेगी। इसका दुष्प्रभाव यह होगा कि समूचा वैश्विक कार्बन चक्र प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। यह समूची दुनिया के लिए खतरे की घंटी है।

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